प्रेरणा-पुंज

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नौगांव नगर के निकट ग्राम धवर्रा निवासी पं. गणेश प्रसाद मिश्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम पीढ़ी के कार्यकर्ता रहे. उनकी चार पुत्रियां, एक पुत्र, पुत्रवधु व् पौत्र हैं। पोस्ट मास्टर से जीवन के करियर की शुरआत कर झाँसी में संघ प्रचारक बने। सन 1948 में महात्मा गाँधी हत्या के आरोप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध के समः छह माह का कारावास हुआ। आपातकाल में भूमिगत रहकर 18 माह सक्रिय रहकर कार्य किया। हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत के प्रकांड विद्वान पं. गणेश प्रसाद मिश्र एक मृदुभाषी, अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे।  उन्होंने कृषि कार्य में रूचि रखते हुए चिकित्सा के खेत्र में ‘ वैध ‘ की उपाधि प्राप्त की।

पुराने लोग उन्हें आज भी ‘ बड़े डॉक्टर साहब ‘ के नाम से जानते हैं। ‘दद्दाजी ‘ के नाम से सुविख्यात वे तृतीय वर्ष शिक्षित होकर आजीवन संघ के सक्रिय स्वयंसेवक रहे।  शिक्षक के नाते अनेक संघ बर्गों में एक एक माह शिक्षक बनकर जाते रहे। शिक्षादान जैसे कार्य में उनकी विशेष रूचि होने से उन्होंने गणित, अंग्रेजी, संस्कृत के विषय में बी.ए., एम.ए. के अनेक छात्र छात्राओं को सदैव ज्ञानोपार्जन कराया। सरस्वती शिशु मंदिर नौगांव में आचार्य से लेखपाल तक उनके शानदार प्रदर्शन रहा।  बे आजीवन गौसेवा में रत रहे।  अपने अंतिम समय में पांच गायों की सेवा सुश्रुषा ही उनका मुख्य कार्य हो गया था।  संभाग में जब कोई प्राइवेट आई.टी.आई. प्रारंभ की, जो उत्तरोत्तर उन्नति करती गयी।  शिक्षा के प्रति उनकी रूचि का ही परिणाम था कि उन्होंने अपनी चारों पुत्रियों को मास्टर डिग्री तथा बी.एड. तक शिक्षित कराया।  वहीँ एक पुत्री व् पुत्र को डॉक्टर ऑफ़ फिलॉसोफी कराई। सभी पुत्रियां भी शिक्षकीय कार्य में है। वहीँ पुत्र संघ के प्रचारकों की श्रेणी में आकर अ.भा. विद्यार्थी परिषद् के प्रान्त अध्यक्ष, प्रान्त प्रमुख व प्रान्त संगठन मंत्री महाकौशल प्रान्त के दायित्यों का निर्वहन करता रहा है। डॉ. राकेश मिश्र भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह जी के कार्यकारी सचिव के रूप में दिल्ली में कार्यरत रहे हैं। वर्तमान में भाजपा मुख्यालय में अनेक दायित्वों का वहन कर रहे हैं। 

 

श्री मिश्रजी ने अयोध्या आंदोलन मै, 1990 की कार सेवा में बढ़ चढ़कर भाग लिया। 1992 में विवादित ढांचा विध्वंस में छतरपुर जिले के दो कार सेवकों में से वे एक थे, जो वहाँ पहुँच सके। 1990 की कश्मीर की ‘एकता यात्रा’ में डॉ. मुरली मनोहर जोशीजी के नेतृत्व में यात्रा के समापन में लाल चौक पर तिरंगा ध्वज फहराने के लिए गए। भारत भ्रमण एवं संस्कृति परिचय  में उनकी गहन रूचि रही। लेह लद्दाख में सिन्धुदर्शन यात्रा रही हो या अमरनाथ की यात्रा, वे हर जगह सपत्नीक सहभागी रहे। अरुणाचल प्रदेश का परशुराम कुंड हो या कन्याकुमारी में धनुष्कोटि तथा गंगोत्री में गौमुख तक की दुर्गम यात्रा या गंगासागर का पवित्र जल, सभी दुर्गम स्थानों पर आम पर्यटक की तरह उन्होंने यात्राएं की। अपने अनुभवों का लेखन साझा किया। साधनों की शुचिता व नैतिकता के पक्षधर श्री मिश्र ध्येय के प्रति समर्पित, दृढ निश्चयी व कठोर परिश्रमी रहे।  जब लोग त्योहारों में प्रसन्नता मनाते, वे अपने कार्य में मौन रूप से लगे रहकर दीं दुःखियों के साथ सेवा में लगे रहते थे।

 

93 वर्ष की आयु में वे कोमा में चले गए। नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) व डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में तीन  गहन चिकित्सा हुई।  न्यूरो वैज्ञानिकों के लिए इतनी उम्र का यह पहले केस था, जिसमें रोगी इतनी तीव्र गति से ठीक होकर पुनः नौगांव अपने घर ही विश्राम करने लगा।  डॉक्टरों का मत था कि इनकी गौसेवा, खानपान,  दिनचर्या से ही इनका जीवन प्रेरणादायी है। 1 नवम्बर, 2016 को प्रातः 6.30 बजे वे इस लोग से मुक्ति पाकर गोलोक धाम को प्रस्थान कर गए।  अंतिम संस्कार में देश विदेश की महान हस्तियों के शोक सन्देश प्राप्त हुए। सम्पूर्ण जिले के प्रमुख व्यक्तियों ने दिवंगत आत्मा को श्रद्धासुमन एवं श्रद्धांजलि अर्पित की। दिल्ली से लेकर गाँव तक शोक की लहर दौड़ गयी। 

 

ऐसे महान प्रेरक व्यक्तित्व को प्रणाम और विनम्र श्रद्धांजलि।